बॉलीवुड में जब भी कोई बड़ी फिल्म रिलीज होने वाली होती है और उसे बड़े स्तर पर प्रमोट करना होता है, तो फिल्म की पूरी टीम मुंबई में डेरा डाल देती है। प्रेस कॉन्फ्रेंस, मीडिया इवेंट्स, स्टार्स के इंटरव्यू और भव्य प्रमोशनल कार्यक्रमों के जरिए फिल्म को घर-घर तक पहुंचाने की कोशिश होती है। लेकिन रणबीर कपूर की ‘रामायण’ के मेकर्स का प्रमोशन प्लान देखकर लगता है कि उन्होंने इस परंपरा को ही नई दिशा देने का फैसला कर लिया है!

फिल्म की रिलीज में अब कुछ ही दिन बाकी हैं, लेकिन मेकर्स मुंबई में बड़े प्रमोशनल इवेंट्स करने के बजाय लॉस एंजेलिस में व्यस्त नजर आ रहे हैं। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या है, जो फिल्म के मेकर्स को अपने ही देश के सबसे बड़े फिल्मी केंद्र मुंबई से ज्यादा लॉस एंजेलिस में दिलचस्पी दिखाने के लिए प्रेरित कर रहा है? क्या उन्हें लगता है कि ‘रामायण’ देखने वाले दर्शक भारत से ज्यादा विदेशों में रहते हैं? या फिर फिल्म की कमाई को लेकर विदेशी बाजार से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगा ली गई हैं?

सबसे दिलचस्प बात यह है कि मुंबई में, जहां बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारे रहते हैं और जहां मीडिया से लेकर फिल्म इंडस्ट्री तक का बड़ा नेटवर्क मौजूद है, वहां अब तक फिल्म से जुड़ा कोई बड़ा सार्वजनिक प्रमोशनल इवेंट सामने नहीं आया है। सितंबर के आखिर में एक कार्यक्रम जरूर हुआ था, लेकिन उसे भी सीमित लोगों के बीच आयोजित किया गया निजी कार्यक्रम बताया गया। यानी जिस फिल्म को दुनिया की सबसे भव्य फिल्मों में से एक के तौर पर पेश किया जा रहा है, उसके प्रमोशन का दायरा फिलहाल काफी सीमित दिखाई दे रहा है।

अब सवाल यह है कि जब फिल्म की रिलीज इतनी करीब है, तो क्या मेकर्स को भारतीय दर्शकों के बीच ज्यादा से ज्यादा पहुंच बनाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए? आखिरकार, भारत में ही रामायण की कहानी से करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। ऐसे में देश के बड़े शहरों में भव्य इवेंट्स, मीडिया इंटरैक्शन और दर्शकों से सीधे जुड़ने वाले कार्यक्रम फिल्म के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं।

विदेशों में प्रमोशन करना गलत नहीं है। भारतीय फिल्मों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार भी अहम है। लेकिन जब फिल्म का आधार ही भारतीय संस्कृति, आस्था और एक ऐसे महाकाव्य पर टिका हो, जिसे देश का बड़ा हिस्सा जानता है, तो अपने ही दर्शकों के बीच फिल्म का माहौल बनाने में इतनी सीमित सक्रियता क्यों?

कहीं ऐसा तो नहीं कि मेकर्स फिल्म को इतना भव्य बनाने में जुट गए कि उसे आम दर्शकों तक पहुंचाने की अहमियत ही पीछे छूट गई? क्योंकि फिल्म का स्केल कितना भी बड़ा हो, आखिरकार टिकट खरीदकर सिनेमाघरों तक दर्शकों को ही आना है।

वरना ऐसा न हो कि मेकर्स दुनिया भर में ‘रामायण’ का प्रचार करते रह जाएं और सिनेमाघरों में फिल्म देखने पहुंचने वाले दर्शकों की संख्या ही सीमित रह जाए!