नितेश तिवारी के हाथ बांधकर बनाई गई रामायण? नमित मल्होत्रा के VFX प्रेम ने कहानी का किया सत्यानाश!
बॉलीवुड में कुछ निर्देशक ऐसे होते हैं, जिनकी फिल्मों को देखकर दर्शकों की आंखें नम हो जाती हैं। वे पर्दे पर सिर्फ कहानियां नहीं सुनाते, बल्कि किरदारों के दर्द, संघर्ष और भावनाओं को दर्शकों के दिलों तक पहुंचाने का हुनर रखते हैं। नितेश तिवारी भी ऐसे ही निर्देशकों में शुमार हैं। 'दंगल' और 'छिछोरे' जैसी फिल्मों से उन्होंने साबित किया है कि उन्हें दर्शकों की नब्ज पहचानने और उन्हें भावनात्मक रूप से जोड़ने का हुनर बखूबी आता है। लेकिन अफसोस कि उनकी फिल्मोग्राफी की यह सबसे बड़ी खूबी 'रामायण पार्ट 1' में कहीं खोई हुई नजर आती है।
सवाल यह है कि जिस निर्देशक ने 'दंगल' में पिता और बेटियों के रिश्ते को इतनी खूबसूरती से पर्दे पर उतारा कि दर्शकों की आंखें नम हो गईं, जिस निर्देशक ने 'छिछोरे' में जिंदगी, दोस्ती और हार-जीत के बीच छिपे दर्द को महसूस कराया, उसी नितेश तिवारी की रामायण में भावनाओं का इतना अभाव क्यों दिखाई देता है? जबकि रामायण जैसी महागाथा में भावनाओं की कोई कमी नहीं है। राम का वनवास, दशरथ का पुत्र वियोग, सीता का त्याग, लक्ष्मण की निष्ठा और भरत का भाई के प्रति समर्पण, ऐसे अनगिनत प्रसंग हैं जो किसी भी संवेदनशील निर्देशक को दर्शकों को भावुक करने का भरपूर अवसर देते हैं।
लेकिन फिल्म देखते हुए ऐसा महसूस होता है कि यहां कहानी और किरदारों की भावनाओं से ज्यादा जोर भव्यता और VFX पर दिया गया है।
आखिर नितेश तिवारी का जादू रामायण में क्यों नहीं चला?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए फिल्म के निर्देशक से ज्यादा उसके निर्माता नमित मल्होत्रा की भूमिका पर नजर डालनी जरूरी है। दुनिया भर में फिल्म को जिस तरह प्रमोट किया जा रहा है, उसमें नितेश तिवारी के निर्देशन की तुलना में नमित मल्होत्रा और उनके VFX विजन को कहीं ज्यादा प्रमुखता मिलती दिखाई देती है।
नमित मल्होत्रा VFX इंडस्ट्री का एक बड़ा नाम हैं। उनकी कंपनी DNEG ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी तकनीकी क्षमता साबित की है। जाहिर है कि रामायण जैसी फिल्म को भव्य बनाने में VFX की अहम भूमिका होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ उसका VFX हो सकता है?
ऐसा प्रतीत होता है कि रामायण के निर्माण में तकनीकी भव्यता को इतनी प्राथमिकता मिल गई कि कहानी की भावनात्मक गहराई पीछे छूट गई। फिल्म का हर बड़ा दृश्य दर्शकों को चमत्कृत करने की कोशिश करता नजर आता है, लेकिन हर बार उनके दिल को छूने में सफल नहीं होता।
क्या नमित मल्होत्रा के विजन के नीचे दब गए नितेश तिवारी?
नितेश तिवारी की पिछली फिल्मों को देखकर यह मानना मुश्किल है कि उन्हें कहानी में भावनाएं पिरोना नहीं आता। वह जानते हैं कि किसी किरदार के दर्द को दर्शकों तक कैसे पहुंचाया जाता है। फिर रामायण जैसी कहानी में वह भावनात्मक जुड़ाव क्यों नजर नहीं आया, जिसकी इस महागाथा से उम्मीद थी?
यहां एक बड़ा सवाल फिल्म के क्रिएटिव कंट्रोल को लेकर भी खड़ा होता है। क्या नितेश तिवारी को अपनी रचनात्मक सोच के मुताबिक फिल्म बनाने की पूरी आजादी मिली? या फिर निर्माता नमित मल्होत्रा का भव्य विजन इतना हावी हो गया कि निर्देशक की अपनी कहानी कहने की शैली पीछे छूट गई?
बेशक, हमारे पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि नमित मल्होत्रा ने निर्देशक के काम में हस्तक्षेप किया या उन्हें अपनी मर्जी से फिल्म बनाने से रोका। लेकिन पर्दे पर दिखाई देने वाले नतीजे और फिल्म के प्रचार का तरीका इस बहस को जरूर जन्म देते हैं।
रामायण को VFX नहीं, भावनाओं की जरूरत थी!
रामायण सिर्फ एक धार्मिक महागाथा नहीं, बल्कि रिश्तों, त्याग, प्रेम, मर्यादा, संघर्ष और बलिदान की ऐसी कहानी है, जिसकी भावनात्मक ताकत सदियों से लोगों के दिलों में बसी हुई है। इसे दर्शकों के सामने पेश करने के लिए सिर्फ शानदार विजुअल्स की जरूरत नहीं थी, बल्कि उन भावनाओं को जीवंत करने की जरूरत थी, जिनकी वजह से रामायण आज भी लोगों के दिलों में बसती है।
VFX आंखों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन किसी पिता के आंसुओं, भाई के त्याग और पति-पत्नी के बिछड़ने का दर्द महसूस कराने के लिए सिर्फ तकनीक काफी नहीं होती। वहां निर्देशक की संवेदनशीलता और कहानी की पकड़ काम आती है।
नितेश तिवारी ने 'दंगल' और 'छिछोरे' में यही संवेदनशीलता दिखाई थी। इसलिए रामायण में भावनात्मक कमी देखकर निराशा और भी ज्यादा होती है।
पार्ट 2 के लिए खतरे की घंटी!
रामायण पार्ट 1 भले ही अपनी भव्यता और VFX के दम पर दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में सफल हो जाए, लेकिन किसी फिल्म फ्रेंचाइजी का भविष्य सिर्फ पहले भाग के विजुअल्स से तय नहीं होता। दर्शक कहानी और किरदारों से जुड़ना चाहते हैं। वे राम के संघर्ष को महसूस करना चाहते हैं, सीता के दुख में शामिल होना चाहते हैं और लक्ष्मण, भरत तथा हनुमान की निष्ठा को अपने दिल में उतारना चाहते हैं।
अगर पार्ट 2 में भी VFX को ही सबसे बड़ी प्राथमिकता दी गई और कहानी की भावनात्मक ताकत को नजरअंदाज किया गया, तो यह फिल्म फ्रेंचाइजी के लिए भारी पड़ सकता है।
नितेश तिवारी को 'दंगल' और 'छिछोरे' वाला अपना जादू दिखाने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। क्योंकि रामायण को एक और VFX से भरपूर फिल्म बनाने की जरूरत नहीं थी। इसे ऐसी फिल्म बनाने की जरूरत थी, जिसे देखकर दर्शकों की आंखें नम हो जाएं और दिल भावनाओं से भर जाए।
आखिरकार रामायण की सबसे बड़ी ताकत उसके चमत्कारी दृश्य नहीं, बल्कि उसकी भावनाएं हैं। और अगर वही पर्दे से गायब हो जाएं, तो फिर चाहे VFX कितना भी शानदार क्यों न हो, फिल्म की आत्मा अधूरी ही रह जाएगी।